राम मंदिर में चोरी कैसे हुई, चोरी का पता कैसे लगा, कुल कितने की चोरी हुई, हीरों के हार, सोने के मुकुट, चांदी की खड़ाऊं, चांदी की ईंटें कहां हैं, ये सारे तथ्य अब खुल कर सामने आने लगे हैं और ये सब चौंकाने वाले हैं। इनसे पता लगता है कि चोर कितने शातिर थे और उनका गिरोह लामबंद होकर काम कर रहा था।
ये कहानी जून के पहले हफ्ते में शुरू हुई लेकिन इसकी एक पृष्ठभूमि है। सबसे पहले वो कमरा, जहां दानपात्र खोले जाते थे, उनमें भरे नोट मेज पर उलटे जाते थे। इस कमरे में 4 मेजें लगी हुई थी। एक main table है जहां गिनती होती थी। इस टेबल के चारों तरफ कुर्सियां लगी हैं जिस पर बैठकर नोट गिनकर बंडल बनाए जाते थे। यहीं चोरी होती थी। इस कमरे में एक शिफ्ट में 22 लोग होते थे। किसी की तलाशी नहीं होती थी। लोग डबल जेबों वाली शर्ट, पैंट पहन कर आते थे। चढ़ावे की गिनती जूते-जुराब पहनकर होती थी। लोग खाने पीने की चीजें काउंटिंग वाले कमरे में लेकर आते थे।
काउंटिंग रूम में बड़े आराम से पार्टियां होती थीं। हर रोज किसी एक की बारी होती थी। कोई 1000 रुपये के समोसे मंगाता था तो कोई अगले दिन 800 रुपये की कचौड़ियां। पैसे चुरा-चुराकर सब अमीर बन चुके थे। पहले दिन से ही इन्होंने किसी भी नियम-कायदे का पालन नहीं किया। हर व्यक्ति की तलाशी, बिना जेब वाले कपड़े, काउंटिंग रूम में खाने पर पाबंदी और बीच-बीच में बाहर जाने पर रोक-हर नियम को तोड़ा।
नियम तोड़ने की शुरुआत सुभाष श्रीवास्तव ने की जिस पर काउंटिंग की निगरानी रखने की जिम्मेदारी थी। पहले दिन काउंटिंग रूम के बाहर सुरक्षाकर्मियों ने सुभाष श्रीवास्तव की तलाशी लेनी चाही तो वह फैल गया, शोर मचाने लगा, कहा, ‘हम संघ के स्वयंसेवक हैं, हम पर कोई संदेह कैसे कर सकता है’। तो चंपत राय ने नियम बदल दिया, आदेश दिया गया कि रोज रोज़ आते जाते समय तलाशी नहीं होगी। कभी-कभार अचानक तलाशी होगी।
अयोध्या की पुलिस का काम तलाशी करना था पर उसे काउंटिंग रूम के आसपास फटकने की भी इजाज़त नहीं दी गई। पुलिस को पूरे परिसर के CCTV की फुटेज उपलब्ध थी। पर जहां नोटों की गिनती होनी थी, उस कमरे की फुटेज पुलिस के कंट्रोल रूम को उपलब्ध नहीं कराई जाती थी। जब मेज पर दानपात्र खाली किए जाते थे तो सामने नोटों के ढेर होते थे। गिनती की जिम्मेदारी अनिल मिश्रा की थी। गिनती करने वाले अनिल मिश्रा के रिश्तेदार थे, टिन्नू यादव के करीबी थे। निगरानी करने वाले सुभाष श्रीवास्तव भी अनिल मिश्रा के आदमी थे। सब ने सोचा, जब ‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का’।
टेबल पर नोटों के ढेर की गड्डियां बनाई जाती थीं। जब-जब मौका लगता, गिनने वाले गड्डियां धीरे धीरे कभी पैंट की जेब में खिसका लेते थे, कभी जूते की जुराबों में छुपा लेते थे और कभी पैंट में पीछे की तरफ डाल लेते थे। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि वहां CCTV कैमरों में ये सारी हरकतें कैद हो रही थीं।
अब सवाल ये है कि इस चोरी का सच सामने कैसे आया? दरअसल जून के पहले हफ्ते में इनमें से एक व्यक्ति ने चंपत राय से शिकायत की कि दान के नोट चुराकर लोग जेबें भर रहे हैं। चंपत राय ने मंदिर में काम करने वाले सेना के कुछ पूर्व अधिकारियों की सलाह ली, तय किया कि कल अचानक तलाशी ली जाएगी। लेकिन चोर काफी चतुर, चालाक थे। उन तक इसकी पहले ही भनक लग चुकी थी कि आज तलाशी होगी। बाहर जाने से पहले सब एक-एक करके बाथरूम में गए और पैसे वहां थैलों में छुपा दिए। तलाशी में किसी के पास से कुछ नहीं निकला।
जब शिकायत करने वाले को डांट पड़ी तो उसने कहा कि उसने तो अपनी आंखों से लोगों को नोटों की गड्डियां जेबों में भरते देखा था। वो कैसे मान लेता? फिर अचानक सफाई करने वाले कर्मचारी को बाथरूम में नोटों की गड्डियां मिलीं तो राज खुला। चंपत राय ने CCTV फुटेज देखा, ये भी देखा कि कुछ लोगों ने कई बार CCTV को कवर करने की कोशिश की। फिर दो चार लोग नोट जेबों में भरते दिखाई दिए। चंपत राय सन्नाटे में आ गए। वह प्राइवेट सिक्योरिटी वालों को लेकर उनके घर पहुंचे जिन्हें उन्होंने चोरी करते देखा था। दिनभर की मशक्कत के बाद काउंटिंग करने वालों के घरों से करीब 80 लाख रुपये बरामद हुए। इनमें 1100 US डॉलर भी शामिल थे। बाद में करीब 20 लाख रुपये इन लोगों के बैंक खातों से और मिले। कुल मिलाकर एक करोड़ रुपये की बरामदगी हुई।
चंपत राय नाराज़ भी थे, परेशान भी और हताश भी। पर वो अपने लोगों को पुलिस के हवाले नहीं करना चाहते थे। उन्होंने कहा, इन लोगों ने गलती तो की है लेकिन अगर पुलिस में केस दिया तो इन लोगों की जिंदगी खराब हो जाएगी, पैसा मिल गया, अब इन लोगों को माफ कर देना चाहिए, उन्हें यहां से हटाकर किसी दूसरे काम में लगा देना चाहिए। लेकिन तब तक बात सार्वजनिक हो चुकी थी। दबाव बढ़ने लगा, तो चंपत राय SIT जांच के लिए तैयार हो गए। SIT ने सारे सबूत इकट्ठा किए। सुभाष श्रीवास्तव और टिन्नू यादव सहित करीब 70 लोगों से पूछताछ की, CCTV फुटेज देखी तो सारा सच सामने आ गया। फिर TV पर खबरें आने लगीं कि हीरे मोती के हार गायब हैं।
रामभक्त राजू मनवाणी ने कहा कि उन्होंने सिंधी समाज की तरफ से चांदी की 200 ईंटे दान में दी थीं। ऑल इंडिया बुलियन ट्रेडर्स एसोसिएशन के नॉर्थ इंडिया हेड अनुराग रस्तोगी ने बताया कि उन्होंने चांदी का दीपक भगवान रामलला के लिए दान दिया था, राम मंदिर के लिए लोगों से चांदी इकट्ठी की थी, उसकी ईंटें बनवाकर चंपत राय को सौंपी थी। एक और भक्त अनीता भारद्वाज ने चांदी का बना कागभुशुंडि दान दिया था। हैदराबाद के राम भक्त श्रीनिवास शास्त्री ने चांदी की चरण पादुकाएं, चांदी की ईंटें और गोल्ड प्लेटेड चांदी का धनुष भी दान दिया था। चूंकि दानपात्र की दरार बहुत छोटी होती है इसलिए ये सारी वस्तुएं दानपात्र में नहीं डाली गई। सारी वस्तुएं हाथों में डिलीवर की गई।
राम मंदिर में ऐसी चीजों के लिए काउंटर बनाए गए हैं। इसीलिए ये आभूषण और उपहार काउंटिंग रूम तक नहीं पहुंचे थे। जब तलाशी हुई तो SIT ने इन्हें ढूंढ निकाला। ये सारे हीरे-जवाहरात, सोना-चांदी चंपत राय के कमरे में सुरक्षित मिले। उन्होंने इन्हें संभाल कर रखा था। इनका पूरा हिसाब किताब लिखकर रखा था पर वो इतने हैरान परेशान थे और उम्र भी काफी है इसीलिए उन्हें याद ही नहीं आ रहा था कि कौन से जवाहरात कहां रखे गए थे। लूट के बाद बरामद 80 लाख रुपये कैश भी चंपत राय ने संभालकर तिजोरी में रख दिए थे। उनके साथ उन सब लोगों के कबूलनामे भी थे जिन्होंने दान पात्र से रुपये चुराए थे।
अब सवाल ये है कि अगर हीरे-जवाहरात, आभूषण, खड़ाऊं सुरक्षित हैं तो काउंटिंग रूम से कितने रुपये की चोरी हुई? मेरी जानकारी ये है कि रुपये चोरी करने की शुरुआत जनवरी 2025 के कुंभ मेले के दौरान शुरू हुई, जब भारी संख्या में श्रद्धालु राम मंदिर आने लगे। औसतन रोज़ पांच से छह लाख रुपये की चोरी हुई। कोई कोई दिन तो ऐसा होता था जब गिनती कुछ हजार रुपये की ही होती थी। जब इसकी जांच की गई तो पता चला ये वो दिन थे जब सिर्फ सिक्के गिने जाते थे। हिसाब लगाने वालों का अंदाजा है कि जब 4 जून को ये मामला खुला तब तक करीब 4 करोड़ से ज्यादा रुपये गायब किए गए लेकिन ये सिर्फ एक अनुमान है। ये काम इतने लंबे समय तक इसीलिए चल पाया कि निगरानी करने वाले मिले हुए थे।
सोने-चांदी और जवाहरात के वेल्यूएशन का काम Minting Corporation of India को दिया जाना था। Minting Corporation के लोग करीब डेढ़ महीने मंदिर परिसर में रहे, उन्होंने कुछ चांदी गलाने का काम भी किया, valuation भी किया पर चंपत राय ने कहा कि Mint के लोगों पर होने वाला खर्चा बहुत ज्यादा है इसीलिए इनके मंदिर परिसर में होने की जरूरत नहीं है। दरअसल वह राम मंदिर में अपने अलावा किसी और को देखना ही नहीं चाहते थे- न Mint को, न पुलिस को, न बैंक के अफसरों को, न किसी CEO को।
RSS की तरफ से करीब डेढ़ साल तक चंपत राय से बार-बार सिस्टम बनाने के लिए कहा गया, कुछ विशेषज्ञों को नियुक्त करने के लिए कहा गया पर वो अपनी ज़िद पर अड़े थे। अब संघ और विश्व हिंदू परिषद के लोगों को लगता है कि उन्हें चंपत राय को मनाने समझाने में नहीं लगना चाहिए था, उन्हें सिस्टम बनाने के लिए सख्ती से कहना चाहिए था पर किसी ने चंपत राय से ये कहने का साहस नहीं किया। पर, अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत। चंपत राय का मंदिर पर एकछत्र राज इसीलिए बना रहा क्योंकि ट्रस्ट के ज्यादातर सदस्य बहुत उम्रदराज़ हैं। ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य मशहूर एडवोकेट के. पारासरण 99 साल के हैं। वो चल-फिर नहीं पाते, इसलिए, ट्रस्ट की बैठकों में हिस्सा नहीं लेते। ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास हैं, 88 वर्ष के हैं। अयोध्या में ही रहते हैं, लेकिन उनकी सेहत बहुत खराब है। ट्रस्ट के काम में उनका कोई दख़ल नहीं होता।
91 साल के स्वामी परमानंद जी महाराज ट्रस्ट के सदस्य हैं। वह हरिद्वार में रहते हैं, ट्रस्ट के रोज़मर्रा के काम की निगरानी करना संभव नहीं है। ट्रस्ट के एक और सदस्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज प्रयागराज में रहते हैं। उनकी उम्र 80 साल से ज़्यादा है, वो भी नियमित रूप से ट्रस्ट की बैठकों में शामिल नहीं हो पाते। कर्नाटक के पेजावर मठ के पीठाधीश्वर स्वामी विश्व प्रसन्न तीर्थ जी महाराज भी ट्रस्ट के सदस्य हैं, उडुपी में रहते हैं। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष हैं स्वामी गोविंद देव गिरि महाराज, वो ज़्यादातर पुणे में रहते हैं। अनिल मिश्रा गोविन्द गिरी महाराज के विश्वासपात्र थे, इसलिए उन्होंने ट्रस्ट के वित्तीय कामों की जिम्मेदारी अनिल मिश्रा को सौंपी थी। चंपत राय, अनिल मिश्रा और निर्मोही अखाड़े के संत स्वामी दिनेंद्र दास ट्रस्ट के सदस्य हैं, तीनों अयोध्या में ही रहते हैं लेकिन दिनेन्द्र दास जी बीमार रहते हैं। इसलिए चंपत राय और अनिल मिश्रा ही राम मंदिर ट्रस्ट का सारा काम संभालते थे। जो चाहे फैसले करते थे, जब चाहें, जैसे चाहें नियम बदल देते थे।
प्रभु श्रीराम के मंदिर में चोरी करने वालों ने जो पाप किया है, उसकी सजा तो उन्हें क़ानून भी देगा और हमारे यहां तो मान्यता है कि मंदिर में चोरी करने वाले को सात जन्मों तक दंड भुगतना पड़ता है। अब RSS और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेताओं की आंखें खुली हैं। 6 जुलाई को चंपत राय और अनिल मिश्रा को हटाकर ट्रस्ट में नई नियुक्तियां की जाएंगी। इन दोनों के अलावा एक और पद खाली है। अयोध्या राजपरिवार के विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन हो जाने के कारण उनका पद खाली है। तीन नए ट्रस्टी नियुक्त होंगे। मेरा सुझाव है कि अगर नए ट्रस्टी बैंकिंग, फाइनेंस और प्रशासनिक क्षमता वाले हों तो बेहतर होगा। राम मंदिर का प्रशासन चलाने के लिए एक professional CEO चाहिए।
तिरुपति मंदिर में काउंटिंग का काम बैंकों के कर्मचारी या रिटायर्ड बैंक अधिकारी करते हैं। उन्हें सिर्फ एक धोती पहनकर काउंटिंग करने की इजाज़त है। सारी counting खुले में सबके सामने होती है। ऐसा foolproof system बनाया जाना चाहिए। मेरा सुझाव है कि इन सबके साथ साथ राम मंदिर में एक Chief Vigilance Officer (मुख्य सतर्कता अधिकारी) को भी नियुक्त किया जाना चाहिए। ऐसा अफसर जो स्वतंत्र हो, जिसकी ईमानदारी को लेकर कोई सवाल न हो, जिसके पास विजिलेंस और जांच का अनुभव हो। हमारे देश में ऐसे ईमानदार पुलिस अफसरों की कमी नहीं है। (रजत शर्मा)
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